Monday, April 15, 2013

तेरे खातिर


















कभी   तनहाइयों   में   तेरी   बातें   सोच   हंस   देता
डसी तनहाइयाँ  हैं  जब  तो  तनहा  दिल  है  ये  रोता
मोहब्बत  के  सफर  में  थी  लिखी तनहाइयाँ ही जब
मोहब्बत   करना  तन्हाई  से  क्यूँ न  तू  सिखा  देता

तेरे  खातिर  ही  दुनिया  से  किया  मैंने  बगावत  था

किया तूने भी अब तनहा और दुनिया से तो पहले था
मेरे खोने के खातिर काफी  थी  तेरी  झील  सी  आँखें
हुई  क्यूँ  आज  वो  दरिया जो  कल मेरा समन्दर था

मै  सांसे  ले  नहीं  सकता  हूँ  तुमसे  दूर   रह   करके

काट पाऊ न इक भी क्षण  बगावत  तुमसे  मै  करके
ये  दुनिया  छोड़ने  का  फैसला  भी  ले  नहीं   सकता
कहीं तू ये न कह  दे  की  मरा  बदनाम  मुझे   करके 

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